पौराणिक विश्वास और ऐतिहासिक महत्त्व का अद्वितीय तीर्थ
सप्तपुरियों में श्रेष्ठ, अति वंदनीय और प्रथम पुरी अयोध्या का वर्णन करते हुए भगवान् शंकर ने अपने ग्रंथ ‘रुद्रयामल’ में कहा है—
काश्यां श्रीविश्वनाथं च सौराष्ट्र सोमनाथकम् ।
नागेशं तु अयोध्यायां तस्मिन्नेव प्रतिष्ठितम् ॥
अर्थात् काशीपुरी में जो स्थान श्रीकाशीविश्वनाथ का है, सौराष्ट्र में जो स्थान श्रीसोमनाथ का है, वही स्थान अयोध्या में श्रीनागेश्वरनाथ महादेव का है।
अयोध्या में रामोपासना और शिवोपासना दोनों ही परंपराएँ समान रूप से प्रतिष्ठित हैं। यही कारण है कि समस्त तीर्थों का भ्रमण करने के उपरांत जब यात्री सप्तपुरियों की शिरोमणि अयोध्या में प्रवेश करता है, तो वह सर्वप्रथम श्रीरामगंगा अर्थात् विष्णुनेत्रजा श्रीसरयू में स्नान करता है और सरयूजल से सरयूतट स्थित श्रीनागेश्वरनाथजी के विग्रह का अभिषेक करता है। अयोध्यातीर्थ की यात्रा का वास्तविक सफलताफल इसी में निहित माना गया है।
भगवान् भूतभावन शंकरजी भगवती षोडशी श्रीत्रिपुरसुंदरी जगन्माता पार्वतीजी से कहते हैं—
स्वर्गद्वारे नरः स्नात्वा दृष्ट्वा नागेश्वरं शिवम् ॥
पूजयित्वा च विधिवत् सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥
(रुद्रयामलतन्त्र अयो० ५। ३०-३१)
अर्थात् स्वर्गद्वार तीर्थ में स्नान कर विधिपूर्वक नागेश्वर शिव का दर्शन-पूजन करने वाला मनुष्य अपने सभी कामनाओं की प्राप्ति करता है।
इसी कारण आज भी आस्तिकजन भगवान् श्रीराम की जन्मस्थली में पदार्पण करने के पश्चात् सरयू स्नान कर सर्वप्रथम श्रीनागेश्वरनाथ का दर्शन करते हैं, तत्पश्चात् श्रीहनुमानजी के विख्यात हनुमानगढ़ी मन्दिर अथवा अपने-अपने गुरुस्थानों की ओर प्रस्थान करते हैं।
📜 पौराणिक कथानक
पौराणिक कथानुसार भगवान् श्रीराम ने अपने समस्त साम्राज्य को आठ भागों में विभाजित कर अपने दोनों पुत्रों लव और कुश सहित अन्य तीनों भ्राताओं के छः पुत्रों—सुबाहु, अंगद, पुष्कर, मणिभद्र, नील और भद्रसेन—में समभाव से वितरित कर दिया। तत्पश्चात् अयोध्या की सुरक्षा का भार श्रीहनुमानजी को सौंपकर वे साकेतधाम को प्रस्थान कर गए।
इस प्रकार महाराज लव को लवपुर (लाहौर) तथा कुश को कौशाम्बी का राज्य प्राप्त हुआ। कालान्तर में श्रीकुश ने अयोध्यापुरी की अधिष्ठात्री देवी की प्रेरणा से अपनी मातृभूमि अयोध्या के दर्शन का निश्चय किया। वे अयोध्या आए और स्वर्गद्वार तीर्थ में स्नान-वंदन करने लगे।
इसी दौरान उनके हाथ का वह कंकण, जो महर्षि अगस्त्य द्वारा महाराज राम को और उनसे कुश को प्राप्त हुआ था, सरयूजल में गिर पड़ा। वह कंकण नागकन्या कुमुदिनी को प्राप्त हो गया। जब बहुत खोजने पर भी कंकण नहीं मिला, तब महाराज कुश ने संदेह किया कि समीप रहने वाले नागराज कुमुद ने उसे छिपाया होगा। उन्होंने नाग को मारने हेतु धनुष पर बाण चढ़ाया।
जब नागराज कुमुद ने अपने प्राण संकट में देखे, तो उसने अपने आराध्य भगवान् शंकर की प्रार्थना की। भगवान् शंकर वहाँ प्रकट हुए और महाराज कुश को क्रोध शांत करने की प्रेरणा दी तथा नागराज को अभय प्रदान किया। भगवान् शंकर के इस आगमन के उपलक्ष्य में महाराज कुश ने वहीं उनकी स्थापना कर पूजा-अर्चना की। तभी से यह विग्रह ‘नागेश्वरनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
‘नागेश्वर-मीमांसा’ के अनुसार महाराज कुश ने नागकन्या चित्रांगदा से विवाह किया। चित्रांगदा शिवभक्त थी। उसके आग्रह पर यहाँ एक विशाल शिवमंदिर का निर्माण कराया गया।
⚔ मन्दिर पर आक्रमणों का इतिहास
ईसा की छठी शताब्दी में हूणनरेश कामान्दार ने पाटलीपुत्र के बौद्ध राजा वृहद्बल से सन्धि कर मथुरा पर अधिकार किया और वहाँ के मंदिरों को ध्वस्त किया। तत्पश्चात् वह अयोध्या पहुँचा और सर्वाधिक सम्पन्न श्रीनागेश्वरनाथ मंदिर पर आक्रमण किया।
अंग्रेज इतिहासकार श्रीकनिंघम के अनुसार, अयोध्या का सात शिखरों वाला नागेश्वर मंदिर ‘सुनहरा मंदिर’ कहलाता था। कहा जाता है कि इसके सातों कलशों पर ७२ मन सोना चढ़ा था, जिसे हूणों ने लूट लिया। तब से पुनः उस पर स्वर्णाभरण नहीं चढ़ाया जा सका।
कालान्तर में पुष्यमित्र ने हूणराज कामान्दार को परास्त किया और उसकी सेना का पूर्णतः विनाश कर दिया।
इसके अतिरिक्त इस मंदिर पर अलाउद्दीन खिलजी का भी आक्रमण हुआ। खिलजी की सेना ‘रौनाही’ में पड़ाव डाले थी। बाहरी भाग ध्वस्त हुआ, किंतु स्थानीय जनता ने ठाकुर परशराम सिंह और श्रीगणराज सिंह के नेतृत्व में साहसपूर्वक प्रतिरोध कर मुख्य मंदिर को सुरक्षित रखा।
तीसरा बड़ा आक्रमण औरंगजेब द्वारा हुआ। उसने निकटवर्ती श्रीत्रेतानाथ मंदिर को ध्वस्त कर मस्जिद निर्मित कराई, जो आज भी खंडित अवस्था में विद्यमान है। हैमिल्टन ने अपनी पुस्तक ‘वॉकिंग ऑफ दी वर्ल्ड’ में उल्लेख किया है कि नागेश्वरनाथ मंदिर को गिराकर मस्जिद बनाने के दो प्रयास असफल रहे।
🏛 ऐतिहासिक गौरव और वर्तमान व्यवस्था
रैमिन्टन, कनिंघम, रेनाल्डस, विन्सेन्ट स्मिथ, मैक्समूलर आदि अनेक पाश्चात्य एवं भारतीय विद्वानों ने इस मंदिर के ऐतिहासिक गौरव का वर्णन किया है। मैक्समूलर ने लिखा—
“इस मंदिर पर न जाने कितनी आँधियाँ और तूफान आए, परंतु यह अडिग और अचल खड़ा रहा।”
महाराज विक्रमादित्य ने अयोध्या की पुनः खोज के समय सर्वप्रथम इसी स्थल का पता लगाया। कथानुसार महाकवि कालिदास को ‘स्त्रीयोनि’ का शाप यहीं मिला था और विदर्भराज का कुष्ठ रोग भी यहीं दूर हुआ।
महाशिवरात्रि एवं पुरुषोत्तम मास में यहाँ भव्य मेला लगता है। यवनकाल में विग्रह एक स्थानीय पंडा के घर सुरक्षित रखा गया। गोसाइयों के आगमन के पश्चात् शिष्य-प्रशिष्य परंपरा से इसकी देखरेख होती रही। वर्तमान में यह मंदिर एक ट्रस्ट के अधीन है, जो अत्यंत सुव्यवस्थित रूप से व्यवस्था संचालित कर रहा है।
यहाँ शिव-विवाह उत्सव अत्यंत राजसी ढंग से मनाया जाता है। अयोध्या में शिवार्चन एवं शिवशक्ति-उपासना की अखंड परंपरा आज भी प्रवाहित है।
अयोध्या में स्थित अन्य प्रमुख शिवमंदिरों में श्रीविघ्नेश्वर महादेव, श्रीनिर्मलनाथ, दर्शनेश्वर और राजराजेश्वर भी उल्लेखनीय हैं। यही कारण है कि अयोध्या के राम या हनुमान मंदिरों में भी शिव-विग्रह की स्थापना अनिवार्य रूप से मिलती है।
गोस्वामी तुलसीदासजी ने राम और शिव को अन्योन्याश्रित माना है। आज भी इस मंदिर में आरती वैष्णव भक्तों द्वारा होती है, जिससे “वैष्णवानां यथा शम्भुः” का कथन साकार होता है।
भगवान् शिव स्वयं कहते हैं—
सोइ मम इष्ट देव रघुबीरा ।
सेवत जाहि सदा मुनि धीरा ॥
