परिक्रमा मार्ग

शास्त्रों में प्रदक्षिणा (प्रदक्षिणा) की अत्यन्त महिमा वर्णित है—

“यानि कानि च पापानि जन्मान्तरकृतानि च।
तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणपदे पदे ॥”

अर्थात्‌ मनुष्य द्वारा जन्म-जन्मान्तर में किये गये समस्त पाप प्रदक्षिणा के प्रत्येक चरण के साथ नष्ट होते जाते हैं।

परिक्रमाएँ अनेक प्रकार की होती हैं— तीर्थ की अन्तर्गृही परिक्रमा, सप्तक्रोशी, पंचक्रोशी, चौदहकोसी, लघु, मध्यम तथा चौरासी कोसी बृहद् परिक्रमा आदि। ये परिक्रमाएँ स्थानविशेष की परम्परा और मर्यादा के अनुसार निर्धारित की जाती हैं।

मनुष्य जाने-अनजाने विविध प्रकार के पापों का भागी बन जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य, ईर्ष्या, राग-द्वेष जैसे स्वाभाविक दोष उसे अनायास ही पापकर्म की ओर प्रेरित कर देते हैं। स्वार्थवश वह कभी असत्य का आश्रय लेता है तो कभी हिंसा जैसे दोषों से भी अछूता नहीं रह पाता। अयोध्या का दिव्य महत्त्व यही है कि सच्चे पश्चात्ताप के साथ यहाँ की परिक्रमा एवं यात्रा करने से मनुष्य इन पापों से मुक्त हो सकता है। शास्त्रों में श्रीअयोध्याजी की परिक्रमा का महान माहात्म्य बताया गया है—

“उपोष्य द्वादशरात्रं नियतो नियतासनः ।
प्रदक्षिणा कृता येन जम्बूद्वीपस्य सा कृता ॥”

(रुद्रयामलोक्त श्रीअयोध्या-माहात्म्य २।६४)

अर्थात्‌ जिसने संयमपूर्वक, नियमयुक्त आहार ग्रहण करते हुए बारह रात्रियों का उपवास कर अयोध्यापुरी की प्रदक्षिणा की, उसने मानो सम्पूर्ण जम्बूद्वीप की परिक्रमा कर ली।

“यः कुर्यात् श्रद्धया भक्त्या अयोध्यायाः प्रदक्षिणाम्।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति॥”

जो श्रद्धा और भक्ति के साथ अयोध्या क्षेत्र की परिक्रमा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

👉 यही श्लोक परिक्रमा के आध्यात्मिक सिद्धान्त का मूल आधार माने जाते हैं।


अयोध्या की प्रमुख परिक्रमाएँ

अयोध्या में कई परिक्रमाएँ प्रचलित हैं, जिनका आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। यहाँ पाँच प्रमुख परिक्रमाएँ मानी जाती हैं— पंचकोसी, चौदहकोसी, चौरासीकोसी, छोटी (अन्तर्वेदी) तथा श्रीरामकोट परिक्रमा। इनमें पंचकोसी, चौदहकोसी और चौरासीकोसी परिक्रमाएँ प्राचीन काल से निर्धारित समय एवं परम्परानुसार सम्पन्न होती चली आ रही हैं।


अयोध्या की चौरासीकोसी परिक्रमा

श्रीअयोध्या की सबसे विशाल ८४ कोस की परिक्रमा २२ दिनों में पूर्ण होती है। इसकी कुल लम्बाई लगभग २०० किलोमीटर है। यह परिक्रमा चैत्र पूर्णिमा को मखौड़ा (मखभूमि) से प्रारम्भ होकर वैशाख शुक्ल अष्टमी को अयोध्या में विश्राम करती है। अगले दिन जानकी नवमी के अवसर पर सीताकुण्ड में पूजन एवं भण्डारे का आयोजन किया जाता है।

यह परिक्रमा अत्यन्त प्राचीन और महत्त्वपूर्ण है, परन्तु मार्ग की दुष्करता के कारण इसे बहुत कम श्रद्धालु पूर्ण कर पाते हैं। फिर भी जो भक्त इसे पूर्ण करते हैं, वे इसे महान आध्यात्मिक साधना मानते हैं।


अयोध्या की चौदहकोसी परिक्रमा

कार्तिक शुक्ल पक्ष की अक्षय नवमी तिथि को लाखों श्रद्धालु चौदह कोस की परिक्रमा करते हैं। अयोध्या क्षेत्र की चौदहकोसी परिक्रमा का सर्वोपरि माहात्म्य माना गया है। मान्यता है कि इस दिन परिक्रमा, स्नान और दान से वर्षभर के पापों का क्षय होता है तथा अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

इस परिक्रमा की कुल लम्बाई लगभग ५० किलोमीटर है और इसे पूर्ण करने में सामान्यतः १२ से १६ घण्टे का समय लगता है। परिक्रमा स्वर्गद्वार से प्रारम्भ होती है। वर्तमान में सरकार द्वारा निर्मित नवीन परिक्रमा मार्ग से श्रद्धालु दर्शननगर-सूर्यकुण्ड पहुँचते हैं, जहाँ प्रथम विश्राम होता है। तत्पश्चात् पश्चिम कोसाहा, मिर्जापुर, बीकापुर ग्रामों से होते हुए जनौरा में द्वितीय विश्राम किया जाता है। जनौरा से खोजमपुर, निर्मलीकुण्ड, गुप्तारघाट होते हुए पुनः स्वर्गद्वार पहुँचकर परिक्रमा पूर्ण होती है।

आज भी असंख्य स्त्री-पुरुष समूहों में इस पुण्ययात्रा को गहन श्रद्धा और आस्था के साथ सम्पन्न करते हैं। अधिकांश श्रद्धालु इसे नंगे पाँव ही पूर्ण करते हैं। परिक्रमा मार्ग पर शासन द्वारा व्यापक व्यवस्थाएँ की जाती हैं तथा दानीजन अलाव, दूध, औषधि आदि की निःशुल्क सेवा प्रदान करते हैं।


अयोध्या की पंचकोसी परिक्रमा

अयोध्या की पंचकोसी परिक्रमा का भी अत्यन्त महात्म्य है—
“पंचकोश करत घोर वज्रपाप कटिहैं।”

देवोत्थानी एकादशी के दिन लाखों श्रद्धालु पंचक्रोशी परिक्रमा करते हैं। यह परिक्रमा लगभग १५ किलोमीटर की है तथा इसे पूर्ण करने में लगभग ४ घण्टे का समय लगता है। अयोध्या निवासी गृहस्थ और विरक्त भक्त प्रायः प्रत्येक एकादशी को भी इसे श्रद्धापूर्वक सम्पन्न करते हैं।


अयोध्या की छोटी (अन्तर्वेदी) परिक्रमा

अयोध्या की छोटी अथवा अन्तर्वेदी परिक्रमा लगभग ९ किलोमीटर की है। यह रामघाट से प्रारम्भ होकर बाबा रघुनाथदास की गद्दी, सीताकुण्ड, अग्निकुण्ड, विद्याकुण्ड, मणिपर्वत, कुबेरपर्वत, सुग्रीवपर्वत, लक्ष्मणघाट और स्वर्गद्वार होते हुए पुनः रामघाट पर आकर पूर्ण होती है।


अयोध्या की श्रीरामकोट परिक्रमा

यह श्रीरामकोट (राजभवन) की लघु परिक्रमा है। अयोध्या निवासी संत एवं भक्त इसे अत्यन्त श्रद्धा के साथ प्रायः नित्य सम्पन्न करते हैं। यह परिक्रमा विशेष रूप से भक्ति और साधना की भावना से जुड़ी हुई मानी जाती है।

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