शास्त्रोंमें श्रीसरयूजी
प्रभु हिय को उल्लास नेत्र आँसू बनि निकसीं।
ब्रह्म-कमण्डलु रहीं ब्रह्मसुत तपसे विकीं ॥
मानसरोवर में वसिष्ठ विधि पुर ते लाई।
सर से कढ़ि सरयू वसिष्ठ तनया कहलाई ॥
विधि कुमार घर घर नदै विधि आज्ञा ते पति किये।
दरश परश स्नान पान ते हरि ढिग यह बन व्रत लिये ॥
पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार एक समय अनुरूप से श्रीहरि के नेत्र से निःसरित आनन्द द्रव जो ब्रह्मा के कमण्डलु में सुरक्षित था। उसे अपने यजमान श्राद्धदेव मनु के लिये वसिष्ठजी ने ब्रह्मा से माँगा तो विधाता ने अपने कमण्डलु को मानसरोवर में उड़ेल दिया। वसिष्ठजी ने मानसर से उसे ब्रह्मसर में भेदित किया। ब्रह्मसर से चलने के कारण सरयू नाम पड़ा। पहले मानसर में थीं, इसलिये मानसनन्दिनी कहलायीं। श्रीवसिष्ठजी के प्रयास से प्रवाहित होने के फलस्वरूप वासिष्ठी, वसिष्ठजा, वसिष्ठतनया आदि एवं श्रीहरि के नेत्रों से निःसरित होने के कारण नेत्रजा कही जाती हैं। श्रीरामजी को अत्यन्त प्रिय हैं, इससे एक नाम रामगंगा भी ख्यात है।
ब्रह्मसर से जब चलीं तो आगे वसिष्ठजी का रथ चला, रथ के पीछे-पीछे श्रीसरयूजी मन्दगति से चलती रहीं, इसी कारण ब्रह्मसर से श्रीअयोध्याजी तक बहुत ही टेढ़े-मेढ़े मार्गों से होकर आयी हैं; क्योंकि वसिष्ठ जी मानव बस्ती एवं उपजाऊ भूमि और वनादिकों को बचाते हुए अयोध्याजी तक आये थे। अयोध्याजी से आगे सरयूजी की धारा सीधे पूरब की ओर चली गयी है, महाभारत में सरयूजी को सात गंगाओं में एक गंगा कहा गया है-
पुरा हिमवतश्चैषा हेमश्रृंगाद् विनिस्सृता।
गंगा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ।।
गंगां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम्।
रथस्थां सरयूं चैव गोमती गण्डकी तथा ।।
अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये।
इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ॥
इसी तरह महाभारत के वनपर्व में लगभग तीन दर्जन परम पवित्र नदियों में सरयूकी गणना है कि इनमें स्नानादि करनेसे तीर्थयात्रा सफल होती है-
सिन्धुनदं पंचनदं देविकाथ सरस्वती।
गंगा च शतकुम्भा च सरयूर्गण्डकाह्वया ॥
चर्मण्वती मही चैव मेध्या मेधातिथिस्तदा।
ताम्रवती वेत्रवती नद्यस्तिस्त्रोऽथ कौशिकी ॥
तुंगवेणा कृष्णवेणा कपिला शोण एव च।
एता नद्यस्तु धिष्ण्यानां मातरो याः प्रकीर्तिताः ॥
श्रीसरयूकी सहायक नदियाँ – वासिष्ठी, धुली भेरी, सेती वाहया, मनोरमा, मेरी, बबई, छोटी सरजू, काली, शारदा, कुटिला (टेढ़ी), कूवानो, राप्ती, इरावती या अचिरावती, छोटी गण्डक, झरही और महा सुन्दे श्रीसरयूजी की सहायक नदियाँ हैं। इन १४ के अतिरिक्त और भी छोटी-छोटी नदियाँ श्रीसरयूजी में मिली हैं। एक महानद घर्घरा (घाघरा) भी मिला है। अनुश्रुति है कि ब्रह्मा की आज्ञा से सरयूजी ने ब्रह्मा के पुत्र घर्घर महानद को पतिरूप में स्वीकार कर लिया, इसी से घर्घर की विशाल धारा को अपने साथ लेती हुई आगे गयी।
अयोध्या सरयूके दक्षिण कूलपर है। इसी से सुदूर उत्तरवाले अयोध्या को सरयूपार ही कहते हैं। एक उदाहरण वेदका देखिये-
गन्धर्व, किन्नर, यक्ष, गुह्यक आदि उपदेवगण इन्द्र के अधीन ही रहते हैं और भूत, प्रेत, पिशाच, दैत्य, दानव, राक्षस आदि उपदेवगण श्रीशिवजी के अनुयायी होते हैं। इन्द्र जिस गन्धर्व को गन्धवों का नायक बनाते हैं, उसे चित्ररथ की उपाधि प्रदान करते हैं। केकयनरेश अश्वपति को गन्धर्वां ने बहुत तंग किया, तब भरत और शत्रुघ्न ने जाकर गन्धर्वाधिप चित्ररथ और उसके सेनापति अर्णाके सहित बहुत-से गन्धर्वो का विनाश कर दिया, तब बचे हुए गन्धर्वां ने जाकर इन्द्र से बताया कि-
उत त्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः । अर्णाचित्ररथावधीः ॥
(ऋग्वेद ४। ३०। १८)
मन्त्र में बहुवचन आर्या आदरार्थ है। मन्त्रार्थ इस प्रकार है-है इन्द्र ! ऐसा हुआ कि उन आर्यश्रेष्ठ भरतजी ने सरयू नदी के पार से आकर शीघ्र ही सेनापति अर्णा और गन्धर्वराज चित्ररथको सेनासहित मार डाला।
सार्वकालिक प्रथा यह है कि पहले से प्रवाहित नदी में जो भी छोटी या बड़ी नदियाँ मिलती हैं, तब उसमें मिलने वाली नदी का नाम संगम तक ही रहता है, आगे पहली नदी का ही नाम चलता रहता है। इस नियम का अपवाद एकमात्र भागीरथी गंगाजी ही हैं। अन्यथा सबके लिये वही नियम है। पुराणों के अनुसार हैमवती ने हिमालय से प्रवाहित होने के पूर्व वरदान माँग लिया था कि मैं जिस नदी में मिलूँ, आगे भी मेरा ही नाम रहे उसका नहीं, इसी कारण गोमुख से आगे बढ़ने पर अलकनन्दा, यमुना, गोमती, मध्य प्रदेश से आयी तमसा, सरयू और शोणभद्र आदि अनेक नदियों का नाम संगम पर ही समाप्त हो जाता है और आगे भी भागीरथी का ही नाम चलता है। अस्तु।
छठीं शताब्दी के आस-पास सुप्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने जब देखा कि अयोध्या से कई योजन पश्चिम घर्घर नामक महानद सरयू नदी में मिला है तो उसने समझा और लिखा कि घाघरा में सरयू मिली हैं और वही घाघरा अयोध्या होते हुए ददरी क्षेत्र होते हुए छपरा के आस-पास दो धार होकर गंगा में मिली है। तबसे ही बौद्ध लोग एवं मुस्लिम शासनकाल में कुछ लोग सरयू को घाघरा कहने लगे।
तथ्य तो यह है कि जहाँ सरयू में घाघरा का संगम है, उसके आगे गंगा में मिलने तक सरयू ही कही जाती हैं कहीं कोई घर्घर या घाघरा नहीं कहता, नहीं जानता। वेद में सरयू ही नाम है, घर्घर नहीं। वेद का एक प्रमाण ऊपर पढ़ चुके हैं। दो प्रमाण और पढ़िये केवल मंत्रभागका ही-
मा वो रसानितभा कुभा कुमुर्मा वः सिन्धुर्नि रीरमत्।
मा वः परिष्ठात् सरयुः पुरीषिण्यस्मे इत सुम्नमस्तु वः ॥
(ऋ०५।५३।९)
अत्रिगोत्रीय श्यावश्य ऋषि मरुद्देवता से शक्ति प्राप्त करके अपने यजमान को आशीर्वाद देते हैं कि-
तुमको अन्तस्तेजस्वी तथा बाहर से कान्तिहीन दिखायी देने वाली अर्थात् धीरे बहने वाली रसा नाम वाली पूर्व भारत की नदी तथा वेगपूर्वक बहने वाला पश्चिम भारत का महानद सिन्धु तुम्हें आत्मसात् न करे [जलसे बाधा न दे] और अगाध जलसे भरी मध्य देश में बहने वाली सरयू नाम की उत्तर भारत की नदी तुमको न घेरे [बाधा न दे], तुम्हें सुख मिलनेसे हमें भी सुख होगा।
सरस्वती सरयुः सिन्धुवर्मिभिर्महो महीरवसायन्तु वक्षणीः ।
देवीरापो मातरः सूदयित्नवो घृतवत् पयो मधुमन्नो अर्चत ॥
(ऋक्० १०।६४।९)
ऋषिगण विश्वदेवा (परमात्मा) से प्रार्थना करते हैं-
परम पूजनीया पंजाब से गुजरात तक बहने वाली सरस्वती नदी मानसरोवर से गंगा तक प्रवाहित होने वाली सरयू नदी हिन्दूकुश पर्वत से निकलने वाली तथा शोर करने वाली वक्षणी नदी उक्त नदियों की अधिष्ठात्री देवी (देवियाँ) प्रेम से भोजन देने वाली माताओं के समान हैं, वे सब परम पुष्टिकारक और अत्यन्त स्वादिष्ट दूध के समान जल देकर हम लोगों को तृप्त करें।
शतपथ ब्राह्मण में जिस खण्ड जलप्रलय का वर्णन है, उसकी चर्चा बाइबिल, इन्जील, तौरेत और कुरान आदि में भी है। उस प्रलय के बाद जब नयी सृष्टि हुई, तब सबसे पहले राजा वैवस्वत मनु ही हुए और उन्होंने ही अयोध्यापुरी का पुनः निर्माण किया, ऐसा महर्षि वाल्मीकिने लिखा है-
मनुना मानवेन्द्रेण या पुरी निर्मिता स्वयम्।
( वाल्मीकीय रामायण १।५।६)
उन्हीं वैवस्वत मनु के लिये ही महर्षि वसिष्ठजी के द्वारा श्रीसरयू (रामगंगा) लायी गयीं।
अधिदेववाद को समझने वाले जानते हैं कि तृण, लता, गुल्म, वृक्ष, नदी, तालाब और पहाड़ आदि सभी सजीव हैं और सब में देवता की स्थिति होती है, इसीलिये श्रीरामचरितमानस में लिखा है कि-
गिरि सागर बन नदी तलावा।
हिम गिरि सबकहँ नेवत पठावा ।।
काम रूप सुंदर तनु धारी ॥
(श्रीरामचरितमानस १।९४/४,५)
यही नहीं, इसके पहले भी लिखा है कि-
सबके हृदय मदन अभिलाषा।
लता निहारि नवहिं तरु साखा ॥
नदी उमगि अंबुधि कहँ धाई।
संगम करहिं तलाव तलाई ॥
(श्रीरामचरितमानस १।८५।१-२)
एक समय था कि पाश्चात्त्य लोग और उनसे प्रभावित अनेक भारतीय भी अधिदेववाद की खिल्ली उड़ाया करते थे कि भला कहीं पेड़-पौधों में भी जीव हो सकता है, जबकि भारतीय लोग नदी, पहाड़, तुलसी, पीपल और बरगद आदि जड़ की पूजा करते हैं, उन सबकी आँख खोलने के लिये भारतीय वैज्ञानिक महर्षि श्रीजगदीशचन्द्र बसु ने समस्त संसार को दिखा दिया कि वृक्षों, लताओं और नदियों आदिमें जीव होते हैं और वे सब दुःख-सुखका अनुभव करते हैं। अस्तु।
जब ददई (ददरी) क्षेत्र में गंगाजी सरयूजी में मिलीं, तब सरयूजी ने विचारा कि वरदान के कारण अब आगे तो गंगा का ही नाम रहेगा, इसलिये अपनी एक धारा अलग फोडकर वे चल पड़ीं। सरयू का पाट और वेग गंगा से अधिक है। अलग होते ही ऋषियों ने सरयजी से प्रार्थना की कि करोड़ों एकड़ उपजाऊ भूमि और अनेक प्रकार की वन-सम्पत्ति नष्ट हो जायगी। अतः आप गंगा में ही समाहित हो जाइये। धारा तो फूट हो चुकी थी, अतः छपरा के पास ही वह दूसरी धारा भी गंगा में मिल गयी।
यह तो सरयूजी के उद्गम और संगम का संक्षिप्त वर्णन है। यह ठीक है कि शारदा और घर्घरा के मिलने से सरयू का पाट बहुत विस्तृत हो गया है।
